Success Story : आज से 14 साल पहले कुछ नहीं था.आइये जानते हैं-“कंगाली से 300 करोड़ के साम्राज्य तक,12वीं पास शुभम गुप्ता की जीरो से हीरो बनने की दास्तां”- उनका परिवार दिवालीया हो चुका था. जिंदगी बेगानी सी हो गई थी, पिता को परिवार चलाना बहुत मुश्किल हो गया था, तभी शुभम गुप्ता ने अपनी जिम्मेदारी समझी और कंपनी ‘बॉन्कर्स कॉर्नर’ (Bonkers Corner) की शुरुवात किये.शुभम गुप्ता की कंपनी ‘बॉन्कर्स कॉर्नर’ (Bonkers Corner) आज भारत के स्ट्रीटवियर मार्केट में एक बड़ा नाम बन चुकी है. आज शुभम करोड़पति है. लेकिन, शुभम ने कैसे बदली अपनी तकदीर, आइये जानते हैं….
नई दिल्ली. हम ऐसा सोचते है कि सफलता की कहानियां बड़े कॉलेज, चमकदार डिग्रियों और आलीशान दफ्तरों से शुरू होती हैं. लेकिन, ऐसा कुछ भी नहीं है, ये हमारी सोच केवल हमारे ऊंचे सपनो मे उड़ान भरने से रोकने वाला है क्यों कि शुभम गुप्ता कि सक्सेस स्टोरीज संघर्ष, असफलता और टूटे सपनों की ‘राख’ से जन्म हुई थी. जैसा कि शुभम गुप्ता की. 300 करोड़ के स्ट्रीट वीयर ब्रांड ‘बॉन्कर्स कॉर्नर’ (Bonkers Corner) का रास्ता बार-बार मुश्किलों ने रोका, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और महज 30 साल की उम्र में ही वो मुकाम हासिल कर लिया, जिसकी कल्पना करना भी अधिकतर लोगों के लिए बहुत मुश्किल है.
मुंबई के साधारण से परिवार में जन्में शुभम गुप्ता के पिता का टेक्सटाइल का कारोबार था. परिवार का गुजारा ठीक- ठाक चल रहा था, लेकिन, 2011 में फैमिली पर संकट आना शुरू हुआ. उस समय शुभम ने 12वीं पास ही किया था और कॉलेज में दाखिल लेने की तैयारी में थे. लेकिन, पिता का व्यापार डूब रहा था और एक दिन उनका परिवार दिवालीया हो गया. घर की आर्थिक सुरक्षा एक पल में खत्म हो गई थी और कॉलेज की महंगी डिग्री अब एक दूर का सपना बन चूका था, ऐसे मे शुभम गुप्ता कि वो सपने भी टूट गए जो कि वह बारसो से देखते आये थे कि कॉलेज जायेंगे और बड़ी डिग्री लेंगे और जीवन मे कुछ बड़ा करेंगे, लेकिन ऐसी स्थिति मे सपना केवल सपना ही रह गया और पूरी जिंदगी बिखर गई.
संघर्ष से सफलता
शुभम के पास दो रास्ते थे, और इन्ही के सहारे-” कंगाली से 300 करोड़ के साम्राज्य तक,12वीं पास शुभम गुप्ता की जीरो से हीरो बनने की दास्तां” की शुरुआत हुई या तो ये परिस्थितियों के आगे घुटने टेक दें या फिर शून्य से शुरुआत करें. उन्होंने दूसरा रास्ता चुना. उन्होंने छोटे-मोटे पार्ट-टाइम काम शुरू किए. इस दौरान उन्होंने गौर किया कि भारतीय युवाओं के बीच ‘स्ट्रीटवियर’ और कूल ग्राफिक्स वाली टी-शर्ट्स का क्रेज बढ़ रहा है. अपनी मामूली बचत से उन्होंने स्थानीय बाजारों से बेसिक टी-शर्ट्स खरीदीं और उन्हें बेचना शुरू किया. धीरे – धीरे यह ट्रिक उनका काम कर गया और सफलता को पाने के लिए रास्ते बनाने लगे.
2014 में शुरू किया बॉन्कर्स कॉर्नर
साल 2014 में शुभम के इस अटूट संघर्ष को एक औपचारिक नाम मिला, Bonkers कार्नर और यही से कंगाली से 300 करोड़ के साम्राज्य तक,12वीं पास शुभम गुप्ता की जीरो से हीरो बनने की दास्तां ने वह नब्ज पकड़ ली थी जिसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां नहीं समझ पा रही थीं. उन्होंने महसूस किया कि नई पीढ़ी (Gen-Z) को सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि एक ‘एटीट्यूड’ चाहिए. उन्हें ऐसा पहनावा चाहिए जो रॉ (Raw), असली और उनके व्यक्तित्व को बयां करने वाला हो. बिना किसी बड़े निवेश या भारी मार्केटिंग बजट के, शुभम ने एक-एक ऑर्डर के साथ इस ब्रांड की नींव रखी. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डिजाइनों की नकल करने के बजाय ‘देसी स्ट्रीट स्टाइल’ को प्राथमिकता दी, जो किफायती भी था और हाई-क्वालिटी भी.ऐसे मे जो लोग काम पैसे खर्च कर के अपने आप को स्टाइलिस्ट दिखाना चाहते थे उनके उमीदो पर यह कंपनी खरा उतरी और कंपनी की ग्रोथ होने लगी.
आत्मविश्वास ने जीता शार्क्स का दिल
शुभम की मेहनत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब वे Shark Tank India के सेट पर पहुंचे, तो उनकी कंपनी पहले ही 100 करोड़ रुपये का राजस्व (Revenue) कमा रही थी और 140 करोड़ के आंकड़े की ओर तेजी से बढ़ रही थी. जब उन्होंने अनुपम मित्तल (Anupam Mittal) और नमिता थापर (Namita Thapar) जैसे दिग्गजों के सामने अपनी कंपनी की वैल्यूएशन 300 करोड़ रुपये बताई, तो पूरा सेट दंग रह गया.लेकिन उनके आत्मविश्वास की वजह से शार्क को उनकी बात माननी पड़ी और शुभम गुप्ता ने शार्क्स के सवालों को भी बड़े चतुराई से जवाब दिया.
जैसा कि अनुपम मित्तल का सवाल सीधा था, “जब आप पहले से ही 30 करोड़ रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं, तो आपको हमारी जरूरत क्यों है?” शुभम का जवाब उनके शांत आत्मविश्वास को दर्शाता था. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे केवल पैसों के लिए नहीं, बल्कि बेहतर लॉजिस्टिक्स, आईटी सिस्टम और रणनीतिक साझेदारी के लिए आए हैं. उनकी ईमानदारी और स्पष्ट सोच ने नमिता थापर को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने बिना किसी कड़े मोलभाव के वही ऑफर स्वीकार कर लिया जो शुभम चाहते थे और इस तरह शुभम गुप्ता शार्क के सहयोग और उनके स्किल्स का इस्तेमाल कर के कम्पनी को नेक्स्ट लेवल तक पहुचायेंगे।