फुलन देवी: एक क्रांतिकारी महिला की जीवन गाथा

भूमिका
भारतीय इतिहास में फुलन देवी: एक क्रांतिकारी महिला की जीवन गाथा- जो अपने संघर्ष, साहस और आत्मबल के कारण हमेशा याद रखी जाएंगी। एक साधारण निम्नवर्गीय ग्रामीण परिवार में जन्म लेने वाली इस महिला ने जीवन की तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए न केवल अपने अपमान का बदला लिया, बल्कि राजनीति में प्रवेश कर समाज के लिए काम भी किया। फुलन देवी की कहानी अत्याचार के खिलाफ विद्रोह, स्त्री सशक्तिकरण और सामाजिक बदलाव की प्रेरणा बन चुकी है।

फुलन देवी: एक क्रांतिकारी महिला की जीवन गाथा

आप यूँ कह सकते हैं कि – फुलन देवी सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक प्रतीक हैं – उस नाराज़, पीड़ित और संघर्षशील भारत की आवाज़, जो हर प्रकार के अन्याय के खिलाफ खड़ा होने की ताकत रखता है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि अत्याचार का जवाब देना ज़रूरी होता है, लेकिन साथ ही यह भी कि बदलाव की असली ताकत लोकतांत्रिक प्रणाली और सामाजिक सेवा में निहित होती है।

विवादों के बावजूद, फुलन देवी ने भारत की सामाजिक संरचना में एक अमिट छाप छोड़ी है। वे आज भी उन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं, जो अपने हक और सम्मान के लिए लड़ रही हैं।

प्रारंभिक जीवन
फुलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गोरहा का पुरवा नामक गांव में मल्लाह जाति के एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम देवी दीन मल्लाह और माता का नाम मूला देवी था। उनका परिवार सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ था। छोटी उम्र में ही फुलन को खेतों में काम करना पड़ता था।

12 वर्ष की अल्पायु में ही उनका विवाह लाला राम नामक व्यक्ति से कर दिया गया, जो उनसे उम्र में कई गुना बड़ा था। विवाह के कुछ समय बाद ही पति द्वारा किए गए अत्याचारों के कारण उन्होंने उसे छोड़ दिया और अपने मायके लौट आईं। यहीं से उनके जीवन की असली संघर्षगाथा शुरू हुई।

उत्पीड़न और बगावत की शुरुआत
गांव में जातिगत भेदभाव, स्त्रियों के साथ हो रहे अत्याचार और पुरुषसत्तात्मक समाज के अन्यायपूर्ण व्यवहार ने फुलन के भीतर एक क्रांति की आग जला दी थी। गांव के कुछ उच्च जाति के लोगों ने उनके परिवार की जमीन हड़प ली थी, और उनके साथ बार-बार दुर्व्यवहार किया गया। एक बार तो उन्हें गलत आरोप में जेल भी भेजा गया।

जब वे जेल से बाहर आईं, तो उन्होंने देखा कि समाज में महिलाओं को कोई इज्जत नहीं दी जाती। उनकी असहायता ने उन्हें बगावत करने पर मजबूर कर दिया। इसी समय उनका संपर्क डकैतों के एक गिरोह से हुआ और उन्होंने बंदूक उठा ली।

डकैतों की रानी
फुलन देवी ने विक्रम मल्लाह नामक डकैत के साथ मिलकर एक गिरोह में शामिल हो गईं। विक्रम ने उन्हें सुरक्षा दी और दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ गईं। विक्रम की हत्या के बाद फुलन ने गिरोह की कमान संभाल ली और कई बार ऊंची जाति के ज़मींदारों और अत्याचारियों पर हमला किया।

1981 में घटित “बेहमई कांड” फुलन देवी के जीवन का सबसे चर्चित और विवादास्पद अध्याय रहा। फुलन ने अपने साथ हुए सामूहिक बलात्कार और अत्याचार का बदला लेने के लिए बेहमई गांव में घुसकर 20 से अधिक ठाकुर पुरुषों को गोली मार दी। इस घटना ने पूरे देश में तहलका मचा दिया। कुछ लोगों ने उन्हें “बदमाश” कहा तो कुछ ने “दबंग महिला” और “नारी शक्ति की मिसाल” बताया।

आत्मसमर्पण
लगभग दो साल तक चंबल के बीहड़ों में सक्रिय रहने के बाद, 1983 में फुलन देवी ने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव की मध्यस्थता में आत्मसमर्पण कर दिया। उनकी शर्तों में यह शामिल था कि उन्हें फांसी नहीं दी जाएगी और उनके गिरोह के सदस्यों को भी मारा नहीं जाएगा।

समर्पण के बाद उन्हें जेल भेजा गया और वे लगभग 11 वर्षों तक जेल में रहीं। इस दौरान देशभर में फुलन के समर्थन और विरोध में कई आंदोलन हुए।

राजनीति में प्रवेश
1994 में फुलन देवी को जेल से रिहा कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी जॉइन की और सक्रिय राजनीति में कदम रखा। 1996 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने मिर्जापुर से चुनाव लड़ा और विजयी हुईं। वह सांसद बनकर संसद तक पहुंची – यह एक ऐतिहासिक पल था क्योंकि एक पूर्व डकैत अब लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत का हिस्सा बन चुकी थी।

उनकी राजनीति का मुख्य उद्देश्य पिछड़े वर्गों, महिलाओं और पीड़ितों के लिए काम करना था। उन्होंने समाज में व्याप्त भेदभाव, महिलाओं पर अत्याचार और जातिगत असमानता के खिलाफ आवाज़ उठाई।

हत्या और विवाद
25 जुलाई 2001 को दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। यह घटना पूरे देश को झकझोर गई। बाद में शेर सिंह राणा नामक व्यक्ति ने हत्या की जिम्मेदारी ली और दावा किया कि उसने “बेहमई कांड” का बदला लिया है।

फुलन देवी की हत्या ने फिर से जातिवाद, बदले की भावना और कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए।

विरासत और प्रभाव
फुलन देवी का जीवन अत्यंत जटिल, विवादास्पद लेकिन प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने समाज में व्याप्त असमानताओं और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई। उनके जीवन पर कई किताबें और फिल्में बनीं। 1994 में शेखर कपूर द्वारा बनाई गई फिल्म “बैंडिट क्वीन” ने उनके जीवन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा का विषय बना दिया। हालांकि फुलन ने इस फिल्म में अपनी छवि के गलत चित्रण को लेकर विरोध भी जताया।

उनकी कहानी ने समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी शोषित क्यों न हो, अगर उसके भीतर साहस और आत्मबल हो तो वह व्यवस्था को चुनौती दे सकता है।

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