बैसाखी क्यों और कब मनाई जाती है ? 2022 में बैसाखी का महत्त्व व इतिहास और यह किस धर्म का त्यौहार /पर्व है ? बैसाखी किसे कहते हैं और बैसाखी कब होता है ? पूर्णिमा / बैसाखी पर निबंध (Baisakhi or Vaisakhi Festival Meaning, Essay, History, Importance and Significance in Hindi)
भारत में सभी धर्मो के लोग एक साथ मिलजुल कर रहते है,जिसके चलते यहां पर प्रति वर्ष बहुत सारे त्योहारों को बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। इसी लिए भारत त्योहारों का देश कहा जाता है। यहा पर जितने भी धर्म के रहने वाले लोग है उन सभी धर्मो के अपने अपने त्योहार है। इस प्रकार यहा साल भर मे हर दिन किसी न किसी धर्म को मानने वाले लोगो के लिए खास होता है। ठीक इसी प्रकार 13 अप्रैल का दिन सिख लोगो के लिए खास होता है। यह समय ही कुछ अलग ही होता है, खेतो मे रबी की फसल पक कर लहलहाती है, किसानो के मन मे फसलों को देखकर खुशी रहती है, तो वे अपनी इसी खुशी का इजहार इस त्योहार को मनाकर करते है। वैसे इस त्योहार के मनाये जाने के कारण को लेकर , कई अलग अलग मान्यताए भी हैं। इस दिन सूर्य मेष राशि मे प्रवेश करता है, यह भी इस त्योहार को मनाये जाने वाले कारणों में से एक कारण है।

इस त्योहार की तैयारी भी सबसे बड़े त्यौहार दीपावली की ही तरह कई दिनो पहले से शुरू हो जाती है, लोग घरो की सफाई करते है, आगन को रंगोली और लाइटिंग से सजाते है, घरो मे पकवान बनाते है। इस दिन पवित्र नदियो मे स्नान का अपना अलग महत्व है। ऐसा भी कहा जाता है कि सन 1699 मे इसी दिन सिक्खो के अंतिम गुरु, गुरु गोबिन्द सिह जी ने सिक्खो को खालसा के रूप मे संगठित किया था, तो यह भी इस दिन को खास बनाने का एक कारण है। सुबह के समय से ही स्नान आदि के बाद सिक्ख लोग गुरुद्वारे जाते है और इस दिन गुरुद्वारे मे गुरु ग्रंथ का पाठ किया जाता है, कीर्तन आदि भी करवाए जाते है। नदियो किनारे मेलो का आयोजन भी किया जाता है और इन मेलो मे काफी भीड़ भाड़ भी होता है। पंजाबी लोग इस दिन अपनी खुशी को अपने विशेष नृत्य भांगड़ा के द्वारा भी व्यक्त करते है। इस प्रकार बच्चे बुड़े बूढ़े महिलाए सभी डोल की आवाज मे मदमस्त हो जाते हैं और हर्षो उल्लास के साथ नाचते गाते है और भांगड़ा करते है। यह पल बहुत ही सुहाना होता है जिसे अलग धर्म के लोग भी देख कर अपने आप को रोक नही पाते है और वे भी उनके इस हर्ष और उल्लास वाले पर्व में शामिल हो जाते है।
इस त्योहार की कुछ खास बाते नीचे तालिका मे दर्शायी जा रही है जैसे – बैसाखी कब है 2022, इसका महत्त्व और बैसाखी त्यौहार पर निबंध।
बहुत समय पहले की बात है, सन् 1699 में सिक्खो के गुरु, गुरु गोबिन्द सिह जी ने सभी सिक्खो को आमंत्रित किया। उनका आमंतरण एक गुरु के रूप में आदेश की तरह था। अतः गुरु का आदेश पाते ही इस धर्म को मानने वाले सभी लोग , आनंद पुर साहेब मैदान मे एकत्रित होने लगे। देखते ही देखते यह इस धर्म के अनुवाइयो का बहुत बड़ा हुजूम इकट्ठा हो गया इस तरह, गुरु के मन मे अपने शिष्यो की परीक्षा लेने की इच्छा उत्पन्न हुई । गुरु ने अपनी तलवार को कमान से निकालते हुये कहा-” कि मुझे सिर चाहिए”, गुरु के ऐसे कढ़ोर वचन सुनते ही सारे भक्त आश्चर्य मे पढ़ गए, परंतु इसी बीच लाहौर के रहने वाले दयाराम ने अपना सिर गुरु की शरण मे हाजिर कर सभी को चकित कर दिया। गुरु गोबिन्द सिह जी उसे अपने साथ अंदर ले गए और उसके अंदर जाते ही उसी समय रक्त की धारा प्रवाहित होती दिखाई दी। वहा मौजूद सभी लोगो को लगा की दयाराम का सिर कलम कर दिया गया है । गुरु गोबिन्द सिह जी फिर पुनः बाहर आये और अपनी तलवार हवा में लहराते हुवे, कहने लगे-” मुझे सिर चाहिए”। इस बार सहारनपुर के रहने वाले धर्मदास आगे आये, उन्हे भी गुरु द्वारा अंदर की ओर ले जाया गया और फिर खून की धारा बहती हुई दिखाई दी। इसी प्रकार और तीन लोगो को जगन्नाथ निवासी हिम्मत राय, द्वारका निवासी मोहक चंद, तथा बिदर निवासी साहिब चंद ने अपना सिर गुरु के शरण मे अर्पित किया। तीनों को भी क्रमश अंदर ले जाया गया,फिर उसके बाद खून की धारा बहती हुई दिखाई दी। सभी को लगा की इन पाचो लोगो की बली चढ़ा दी जा चुकी है, परंतु इतने मे ही गुरु इन पाचो लोगो के साथ बाहर आते हुये दिखाई दिये। सब की आंखे खुली की खुली रह गई। गुरु ने वहां उपस्थित लोगो को बताया कि-‘ इन पाचो की जगह अंदर पशुओं की बली दी गयी है, मै इन लोगो की परीक्षा ले रहा था और ये लोग इस परीक्षा मे सफल हो गए हैं।” गुरु ने इस प्रकार, इन पांचों लोगो को अपने पाच प्यादो के रूप मे परिचित कराया तथा इन्हे अमृत का रसपान कराया और कहा कि आज से तुम लोग सिह कहलाओगे और उन्हे बाल और दाढ़ी बढ़े रखने के निर्देश दिये, और कहा कि वे लोग अपने बालो को सवारने के लिए कंघा अपने साथ रखे, आत्म रक्षा के लिए कृपाण रखे, कच्छा धारण करे, तथा हाथो मे कडा पहने। गुरु ने अपने शिष्यो को निर्बलों पर हाथ न उठाने के निर्देश दिये। इसी घटना के बाद से ही गुरु गोबिन्द राय, गुरु गोबिन्द सिह कहलाये और सिख्को के नाम के साथ भी सिह शब्द जुड़ गया और यह दिन भी अत्यंत खास हो गया।
इस त्योहार से जुड़ी एक दूसरी मान्यता भी है जो महाभारत के पांडवो के समय की है। ऐसा बताया जाता है कि जब पांडव अपने वनवास के समय पंजाब के कटराज ताल पहुचे, तो उन्हे बड़ी जोरों की प्यास लगी और वे अपनी प्यास को बुझाने के लिए युधिष्ठिर को छोड़कर चारो भाई जिस सरोवर के पास पहुचे, वहा के जल का पान उन्होने यक्ष के मना करने के बाद भी किया, जिसके परिणाम स्वरूप, उन चारो की मृत्यु हो गयी। लेकिन जब बहुत देर तक अपने भाइयो को वापस आता न देख युधिष्ठिर को , अपने भाइयो की चिंता होने लगी और वे उनकी तलाश मे निकल पड़े । जब युधिष्ठिर उस तालाब के पास पहुचकर पानी पीने के लिए आगे बढ़े तब यक्ष पुनः आए और युधिष्ठिर से कहने लगा, कि पहले मेरे प्रश्नो का उत्तर करे, फिर ही आप पानी पी सकते है। इस प्रकार यक्ष प्रश्न करते गए और युधिष्टिर उत्तर देते गए, यक्ष उनसे प्रसन्न हुये और उन्हे अपने भाइयो के मृत होने की बात बताई और कहा कि आपके भाइयो मे आप किसी एक को जीवित करवा सकते है। तब यीधिष्ठिर ने अपने भाई सहदेव को पुनर्जीवित करने की प्रर्थना की यक्ष ने आश्चर्य से पूछा, कि अपने सगे भाइयो को छोड़कर अपने सौतेले भाई को जीवित करवाने की मांग आपने क्यू की। तब युधिष्ठिर ने उत्तर मे कहा की, माता कुंती के 2 पुत्र जीवित रहे, इससे अच्छा होगा की माता माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहे, युधिष्ठिर की बात से यक्ष प्रसन्न हुये और उन्होने उनके चारो भाइयो को जीवन दान दे दिया। तब से ही इस दिन पवित्र नदी के किनारे विशाल मेला लगता है और जुलूस भी निकाली जाती है । जुलूस मे पाच प्यादे नंगे पाव सबसे आगे चलते है और बैसाखी का त्योहार हर्षो उत्साह के साथ मनाया जाता है ।
बैसाखी पर्व कब मनाया जाता है (Baisakhi Festival 2022 Date)
सामान्यतः यह त्योहार पूरे भारत वर्ष मे मनाया जाता है, परंतु पंजाब और हरियाणा मे इस त्योहार की रौनक कुछ और ही रहती है। यह पर्व हर साल 14 अप्रैल को मनाया जाता है। हर साल मनाये जाने वाले इस त्योहार को सिक्खों मे विशेष महत्त्व है। आशा करते है कि आपकी बैसाखी शुभ और समृध्वान हो । पर्यावरण की इस मार के बाद भी आपकी फसले उन्नत हो और इस वर्ष से ज्यादा समृद्ध वान आनेवाला अगला बैसाखी पर्व हो।
बैसाखी पर्व का महत्त्व (Baisakhi or Vaisakhi Festival Importance)
बैसाखी का पर्व विशेषतः किसानो का प्रमुख त्योहार मना जाता है, किसान इस दिन अपनी अच्छी फसल के लिए भगवान को धन्यवाद देते है और ऐसे ही हमेशा समृद्धि वान बने रहने के लिए भगवान से कामना भी करते है।
बैसाखी पर्व को कैसे मनाते हैं ? (How to Celebrate Baisakhi)
बैसाखी पर्व को हर्षोल्लास से मनाने के लिए हर एक मोहल्ले, शहर में मेले का आयोजन किया जाता है। वैशाखी के मेले का विशेष रूप से महत्व है। वैशाखी पर्व का मेला नदी, नहर, तालाब या फिर मंदिरों के किनारे लगाया जाता है। बैसाखी पर्व के 1 दिन पहले ही इसके लिए एक मुख्य रूप से बाजार लगाई जाती है और इस बाजार में लोगों की आवश्यकता की सभी चीजें बिकती है। बैसाखी पर्व के मेले में तरह-तरह की दुकानें सहित एवं बड़े-बड़े झूले भी लोगों और बचो के मनोरंजन के लिए लगाए जाते है। कुल मिलाकर इस पावन पर्व को लोग बहुत ही हंसी खुशी से मनाते हैं और एक दूसरे को गले लगाकर सारे पुराने गिले-शिकवे भूल जाते हैं।यह त्योहार प्रेम और भाईचारा का प्रतीक भी है जहा पर लोग एक दूसरे के मंगलमय जीवन के लिए शुभ कामना भी करते हैं।
FAQ
Q : बैसाखी का त्यौहार कौन से धर्म के लोग मनाते हैं ?
Ans : ज्यादातर सिख धर्म के लोग।
Q : बैसाखी का त्यौहार कैसे मनाया जाता है ?
Ans : मेले लगाये जाते हैं, जिसमें कई दुकानें, झूले एवं अन्य बहुत सारी चीजें होती है।
Q : बैसाखी 2022 में कब है ?
Ans : 14 अप्रैल।
Q : बैसाखी के दिन क्या पकवान बनते हैं ?
Ans : हलवा, पुड़ी, मक्के की रोटी एवं सरसों का साग।
Q : बैसाखी का त्यौहार कहां मनाया जाता है ?
Ans : पंजाब एवं हरियाणा में।
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