जेल की होली –
जी हाँ आप सही पढ़ रहे हैं -“जेल की होली “मतलब जेल मे होली मनाना यानी जो भी भाई – बहन समाज मे रहते हुये कुछ ऐसा कृत्य कर देता हैं जो कि कानून कि नजर मे अपराध कि श्रेणी मे आता है और उसे प्रशासन दोसी समझाता है तो उसको जेल भेज दिया जाता है।

जेल की होली
जेल मे वह बंदी बन कर रहता है जब तक उसके ऊपर अपराध ना सिद्ध हो जाये और अपराध सिद्ध होने के बाद वह -“कैदी “कहलाने लगता है और उसका पोसाग यानी पहनावा सफेद कपड़ो के रूप मे हो जाता है। लेकिन आज कल का जमाना थोड़ा अलग ही है क्यों कि बहुत सारे निर्दोष लोगो को भी कोई झूठा आरोप लगा कर जेल भेज दिया जाता है।
ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ जहा मेरे ऊपर जो मैंने कृत्य नही किया था, वह भी FIR मे बढ़ा चढ़ा कर लिख दिया गया और ऐसे मे मुझे भी जेल घूमने और अच्छे से समझने का मौका मिला। वैसे तो जो हम बाहर कि दुनिया मे किसी के छोटे से बस्तु को आसानी से पा लेते हैं लेकिन वही छोटी सी बस्तु वहां दुर्लभ हो जाती है लेकिन असंभाव नही क्यों कि अगर हम उसकी उचित कीमत अगर चुकाएंगे तो वह भी वहां मिल जाएगी जैसे मे एक छोटा सा कागज का सफेद टुकड़ा -जो बाहर बड़े आसानी से मिल जायेगा लेकिन जेल मे एक पर्ची बनाने के लिए इसे भी पाना इतना आसान तो नही है, मिलेगा लेकिन जो लोग जेल के अंदर बंदी भाई लिखा -पढ़ी का काम करते हैं उनसे बहला -फुसला कर ले सकते हैं, मतलब साफ हैं बाहर कि दुनिया एक अलग ही दुनिया है और जेल की दुनिया एक अलग ही दुनिया है।
जहाँ पर जाने के बाद आप के सारे अधिकार छीन जाते हैं बस कुछ ही अधिकार रह जाता है जिससे आप जीवित रह सके, इसी लिए यहाँ जाना ठीक नही है, यहाँ जाना नर्क मे जाने के समान है ऐसा हम कह सकते हैं लेकिन ये कहना उतना उचित नही होगा क्यों की पहले जो जेल जाते थे और उनको इतनी यातनाये दी जाती थीं जो नरक समान थीं लेकिन आज कल अपराधी से ज्यादा निर्दोष लोग, जो बस किसी तरह फ़सा दिए जाते हैं और उनको जेल हो जाती है, इस चीज़ को ध्यान मे रखे तो जेल मे सख्त का ना होना अपने जगह पर सही भी है।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था और मैं जेल मे बंद था और एक लम्बी सुकून की सांस ले रहा था जहाँ मेरे पास कुछ भी नही था, ना मोबाइल फ़ोन ना मेरे अपने लोग मैं जैसा इसदुनिया मे खाली हाथ आया था उसी तरह खाली हाथ उस जेल की दुनिया मे था, लेकिन ये अलग बात है की शरीर पे कपडे थे और वहां जाने के बाद कुछ बंद बंदी भाइयों की मदद से कुछ दैनिक जीवन मे उपयोग होने वाली बास्तुए मैंने जुगाड़ से इकठा कर लिया था लेकिन वह बस ऐसा ही था जब तक इस दुनिया मे रहना है तभी तक के लिए इसके बाद वह वहीँ त्याग कर के आने योग्य था।
वह समय तो बड़ा कठिन था लेकिन बड़ा ही शांति प्रदान करने वाला था अगर आप को अपने परिवार की चिंता ना हो और आप आपने बाहरी दुनिया के काम के नुकसान के भय से भय मुक्त होतो, लेकिन इन सब बातो की चिंता कराना तो बेकार था, क्यों की जोभी कराना था वह सब बाहर वाले ही करते और मुझे बाहर निकालते, तो ऐसे मे मैं उनके ऊपर ही छोड़ कर आपने सुकून की अनुभूति मे था आप इसको मेरी मजबूरी कह लो या समय का सदुपयोग।बस मुझे वही ठीक लगा और मैं इसी अंदाज से समय बिता रहा था।
इसी कड़ी मे होली भी आ गई और एक चारो तरफ होली की चर्चा भी थीं, सभी दुखी बंदी भाइयों के चेहरे पर थोड़ा सा होली आने की खुशी थीं वह भी इस बात की कि मेरे सगे सम्बन्धी होली पर मुझ से मुलाक़ात करने आएंगे और उनसे दुख -सुख साझा कर के सुकून की अनुभूति होगी और इसमें सब से बिशेष बातें मुक़दमा से सम्बंधित होती हैं कि मुक़दमा मे क्या चल रहा है और कब जेल से ज़मानत मिलेगी।लेकिन जेल प्रशासन ने सभी के इरादों पर पानी फेर दिया यानी जिस दिन होली थी उसदिन मुलाक़ात बंद करा दिए और उस दिन होली भी जेल मे नही मनाई गई, यानी ” जेल की होली ” पुरे भारत की होली बितने के बाद अगले दिन होली मानाने के लिए आदेशित किया गया।
“अभी भला कौन इन अपराधियों को होली खेलवाये, अगर उनको होली खेलना होता तो वह बाहर ही रहते अच्छे से और खूब होली खेलते “, सायद जेल प्रशासन का ऐसा भी सोचना हो सकता था या ये भी हो सकता था -“चलो पहले हम अपनी होली मानते हैं अपने बीबी बच्चों मे,अपने सगे सम्बन्धियों मे फिर इनका देखेंगे “, या उनको डर भी रहता है की अधिकतर पुलिस कर्मी होली की छुटी पर रहते है तो इनको कौन संभालेगा, ऐसे ही कई सारे कारण से जेल की होली, समाज की होली खत्म होने के बाद मनाये जाने के लिए।
लेकिन ऐसे मे जो परिवार इस रंगों के त्यौहार मे अपनी होली समाज मे ना मना कर अपनो के साथ, उनके चेहरे पर एक ग़ुलाल लगा कर खुश होना चाहते थे उनका अधिकार और खुशियाँ छीन गई क्यों की उनके अपने सगे जो जेल मे बंद थे और उनको समाज भी ठीक नही लगता होगा क्योकि उनकी दुनिया जेल मे कैद थी। और तो और समाज वाले होली के दिन और जेल की होली वाले दिन, यानी दोनों ही दिन मुलाक़ात बंद था।
खैर इन सब बातो से क्या ही किसी को फर्क पड़ेगा, जेल की होली जेल जैसे ही होनी थी, सुबह हुआ -चारो तरफ होली है होली है कर के बंदी बैरेक से चिलाते और सुबह के समय बैरक खुलने के बाद सभी बाहर आये और अपना नित्य क्रिया क्रम करने के बाद होली की तैयारी मे जुट गये, बैरक से बाहर निकले और अपने हाते मे पहुंच कर बाजार किये जैसे कि कुछ मिठाईया ख़रीदे, कुछ अबीर और रंग लिया फिर सभी ने होली का हुर्दग चालू किया।लेकिन सब से पहले बैरक से बाहर 8 बजे वाली गिनती शुरू हुई और एक पुलिस कर्मी गिनती करने के बाद -“होली मुबारक” बोल कर सभी को सुरक्षित होली खेलने के लिए नसीहत दे कर चला गया और उस दिन सभी मोटे -मोटे लाठी के साथ भी थे और होली मानाने की जेल के अंदर आजादी दी गई।
जब सभी का रंग और ग़ुलाल खत्म हो गया तो भाइयों मे शुरू किया कीचड़ होली, फिर क्या -फिर कीचड़ खत्म तो पानी डाल डाल कर कीचड़ बनाओ होली, ऐसे ही होली चलता रहा मानो जेल मे भग डर हो रही हो, ऐसा ही चलता रहा और जेलर साहब एक ढोलक और, चार -पांच झाल वाले बंदी भाइ और तमाम पुलिस कर्मी के साथ झाल और ढोलक बजवाते हुये, ग़ुलाल उड़ाते हुये, 10-15 लाठी धारक नंबरदारों के साथ सभी हाताओ मे आये और रंग जमाये।
बंदी भाई भी सोर मचाये, ग़ुलाल उड़ाए और जो रोज उनसे डरते थे उनसे दूर खड़े रहते थे वह भी उनके गालो को ग़ुलाल के साथ साहलाये और अपने उपद्रव से कभी -कभी उनको सहमाए भी, जेलर साहब दल बल के साथ होने के बावजूद भी जल्दी से दूसरे हाते मे चले जाते और ऐसे कर के होली सम्पन कराये।
ऐसा ही उधम चलता रहा और एक बजने को आ गया, सभी हाते मे बेचे जा रहे खाने को अपनी इच्छा और पैसे के हिसाब से ख़रीदा और अपने रोज के जेल के खाने-सात रोटी, पानीवाली डाल, थोड़े से बे स्वाद सब्जी को अलग बनाया और खा पी कर बैरक मे बंद हो गये।
फिर तीन बजा और बैरक खुला जिसको जब जैसा नहाना धोना था, वो नहा धो कर बाहर निकले और जेल द्वारा स्पेशल खाना जो उसदिन मिलने वाला था उसके इन्तेजार मे थे, वह भी समय आया और सभी बंदी भाइयों को सत पुड़ी, थोड़ा दे स्वाद लेकिन उसदिन के हिसाब से स्पेशल सब्जी मिला, जिसको फिर स्वादिष्ट बनाया गया जैसे की, जेल मे चटनी कुटाई हुई और, एक 50 रुपये मे स्पेशल सब्जी ख़रीदाया और साथ मे वेज बिरयानी चावल के साथ पापड़ और सालाद का भी ब्यवस्था हुआ और जम कर खाया गया और फिर गहरी नींद मे सोया गया।
फिर सुबह -सुबह कानो मे एक आवाज़ सुनाई दी -“ओय सभी उठो, बाहर निकलो और गिनती दो “ऐसे कर के अगले दिन की शुरूवात हुई और जेल की होली बीत गई।
ऐसा ही कर के एक -एक दिन बीतता गया।
खैर मैं हमेशा चाहूंगा आप के साथ कभी ऐसी स्थिति ना बने की आप लोगो को -जेल की होली “खेलनी पड़े, मेरी इस होली यही शुभ कामना होगी आप लोग समाज की होली खेले …